नरेगा से मनरेगा तक का ये सफर शायद ऐसे ही चलता रहेगा आज ओर कल भी, इसमें व्याप्तअनियमिता को सर्वदा दरकिनार कर गांव के मजदूरों के जेब मे पैसा डालना ही रह गया है। मैं सरकारों को दोष नही देता न ही इसके स्वरूप को जिस नियत ओर नियति से चल रहा है उसको देख कर चिन्तित भी हूँ आखिर कब तक ऐसे ही चलता रहेगा।
मेरी पृष्ठभूमि गांव की है मैंने ये सब को जिया है देखा है और हमेशा महसूस किया है उत्तराखंड जैसे राज्यों मैं छोटे किसानों मैं लोग Modern Agriculture System or Technology तो दूर की कौड़ी है अपनी पारम्पारिक खेती से भी दूर हो गए हैं आज हर घर मे नल है हर घर विधुत है हर गांव मे रोड है फिर भी पलायन हुआ ऐसा क्यों ?
मैं भी रोजगार के लिए 10 साल से घर से भर हूँ मुझे भी गांव मे अच्छा लगता है जितना लड़ सकता था लड़ा लिकिन अन्तवागत्वा थक हार कर निकल पड़ा।
कुछ लोंगो निसंदेह फायदा होता है लेकिन धरातल पर सच्चाई किसी से छुपी नही है नाबार्ड की योजनाओं मैं कोई कमी है क्या लेकिन वो केवल फाइलों मैं रहती है अनगिनत स्वयं सहायता समूह हैं सरकारी योजनायें हैं पर धरती करे पुकार कुछ हट के करे सरकार।
0 से 0 का सफर है, सरकार पब्लिक की जेब मे पैसा देना का ये माध्यम केवल बंदर बांट जैसा ही है,
अगर सरकार कुछ करना चाहती है तो स्वरोजगार को एक नया आयाम दिया जा सकता है ।
एक ऐसी व्य्वस्था क़याम की जय गाओं मैं लोग स्वरोजगार से जुड़ सके नाबार्ड ओर मनरेगा एक दुसरे के पर्याय हैं सरकार को एक ऐसा मोडल काम करे जो PPE मोड़ मैं काम करे इसमें पारदर्षिता के लिए राज्य सरकार और राज्यों और केंद्र सरकार का नियंत्रण रहे।
राज्यों को उनकी भौगोलिक एवम प्रकिर्तिक रूप से जिस भी छेत्र मैं जिला स्तर ब्लॉक स्तर और गांव स्तर पर रैंकिंग की जाय जो जैसा उसका मूल्यांकन सुप्रीमकोर्ट या सरकार द्वारा की जाय।
देश मे ये मोडल एक लिमिटेड जैसा चलाया जाय निसंदेह लोकल को वोकल हुए बिना ग्लोबल किया जा सकता है मोदी सरकार मैं विज़न भी है और मिशन भी है और visionary Leadership भी है।
पूरे तंत्र मैं सही रूप मे पारदर्षिता होगी हर हाथ पे रोजगार भी होगा हमारा अर्थवयवस्था भी मजबूत होगी।
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